अमेरिका इकॉनमी की दुनिया का ग़ालिब है। उनका एक शेर है- 'कर्ज की पीते थे मय...'। वैसे, इकॉनमी के इस फलसफे में अमेरिका ग़ालिब के उस शेर से भी थोड़ा आगे बढ़ गया है। कर्ज के मामले में वह मय तक ही सीमित नहीं रहा। पूरे बाजार को ही उसने कर्ज के खाते में डाल दिया। घर कर्ज पर। गाड़ी कर्ज पर। खाना-पीना कर्ज पर। कर्ज सिर्फ कर्ज नहीं रहा, अमेरिका की जीवन पद्धति बन गया।
अमेरिकी जीवन में एक रोचक संबंध बड़ा आम दिखाई देता है- 'लिव-इन रिलेशनशिप'। यह लिव-इन रिलेशनशिप कुछ और नहीं, उधार की शादी है। बड़ा आजाद संबंध है, जैसे ओपन इकॉनमी। जिस दिन लगे कि अब ज़िंदगी का बाकी उधार इस साथी के साथ नहीं चुकाना, तो उठाओ सूटकेस और खिसक लो। इस उधार की शादी में जो बच्चे पैदा हो जाएं, वे जिसके गले में पड़े रह जाएं, वही उनसे निपटे ब्याज की तरह।
हिंदुस्तान में एक कहावत चला करती थी- 'उधार प्रेम की कैंची है'। अमेरिका में उधार संबंध की पहचान बन गया। कौन था जिस पर किसी का कर्ज नहीं था। यहां बात एहसानों के कर्ज की नहीं, डॉलर के कर्ज की हो रही है। संबंध डॉलरों में बनने लगे। प्रेम डॉलरों में बरसने लगा - 'तुम उधार ले कर जितना खर्च करोगे, तुम्हारी प्रेमिका तुमसे उतना ही प्रेम करेगी। तुम उसे फूल दोगे, वह मुस्कराएगी। तुम उसे डिनर पर ले जाओगे, वह तुम्हारा चुंबन लेगी। तुम उसे हीरे का ब्रेसलेट दोगे, तो वह तुमसे शादी भले ही न करे, लेकिन शादी की कमी महसूस नहीं होने देगी।'
ग़ालिब कर्ज की मय पीते थे। शराब का सीधा संबंध उनके मूड से था। शायरी के मूड से। अमेरिका में कर्ज का सीधा संबंध मूड से ही है। बाजार के मूड से। ग़ालिब के कर्ज का फंडा सीधा सादा था : उधार लो और शराब पीओ। अमेरिका का फंडा भी सीधा सादा है : ग्राहक को कर्ज देकर ही वह माल खरीदेगा। ज्यादा कर्ज दो, वह ज्यादा माल खरीदेगा। ज्यादा माल बिकेगा तभी बाजार पनपेगा। बाजार पनपेगा तो अमेरिका पनपेगा।
कितना सरल फलसफा है - ग्राहक को उधार लेने के लिए उकसाओ। हर हालत में उधार दो। जरूरत हो तो उधार लेकर उधार दो। लोग कर्ज ले रहे थे। जिसे देखो वही कर्ज ले रहा था। बाजार बड़ा होता जा रहा था। समृद्धि के महल खड़े हो रहे थे। महल के खंभे मोटे और मजबूत दिखते थे। गुंबद बड़े शानदार थे।
लेकिन, अमेरिकी महल की पूरी नींव कर्ज पर टिकी थी। कर्ज की नींव पर खड़े महल को गिराने के लिए किसी भूकंप की जरूरत नहीं होती। बस, जरा सी मिट्टी खिसकना ही काफी होता है। कर्जदारों की इस लंबी श्रृंखला में बस किसी एक कड़ी के टूटने की देर थी। एक कमजोर कड़ी टूटी नहीं कि अमेरिकी मोतियों की माला बिखर गई।
ग़ालिब कर्ज लेते थे, शराब पीने के लिए। लोग उन्हें कर्ज दे भी देते थे। सब जानते हैं कि जो आदमी कर्ज लेकर शराब पीता है, वह कभी उधार चुका नहीं सकता। फिर भी लोग ग़ालिब को कर्ज देते थे। क्योंकि ग़ालिब में एक बहुत बड़ी खूबी थी कि वे शायरी लाजवाब करते थे। कर्ज देने वाले सोचते होंगे, 'ठीक है भई, ब्याज नहीं देता तो क्या हुआ, शेर तो बढ़िया कहता है। पैसे नहीं लौटाता, पर मन तो खुश कर देता है।'
क्या अमेरिकी बाजार ने कभी किसी का मन खुश किया? मन तो क्या खुश करता, अब सबका जीना जरूर दूभर कर रहा है। मेरे खयाल से ग़ालिब को उधार देना समाज की जिम्मेदारी थी, क्योंकि ग़ालिब संस्कृति को पोस रहे थे। संस्कृति को पोसने वालों के पास पैसों की कमी तो रहती है। वे पैसे भले ही उधार लेते हों, लेकिन इंसानियत के ऊपर एक बहुत बड़ा कर्ज छोड़ जाते हैं- सांस्कृतिक चेतना का कर्ज। ग़ालिब ने कहा था- 'कर्ज की पीते थे मय और समझते थे कि हां, रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।'
ग़ालिब की फाकामस्ती से उपजा रंग तो आज तक चमचमा रहा है, जबकि अमेरिकी बाजार का कर्ज अब फाका करवाने की सोच रहा है।

कमरे में लगे बल्ब सिर्फ रोशनी देने का काम ही नहीं करेंगे। इनके उजाले से कंप्यूटर और फोन ही नहीं, कारों को भी इंटरनेट से जोड़ा जा सकेगा।
जैसे ही आप बल्ब का स्विच ऑन करेंगे, जहां-जहां लाइट होगी, वहां रखे कंप्यूटर या फोन में इंटरनेट नेटवर्क सक्रिय हो जाएगा। हालांकि, यह साधारण बल्ब नहीं होंगे। इसके लिए एलईडी (लाइट एमिटिंग डायोड) बल्बों का इस्तेमाल किया जाएगा। यह बल्ब बिजली की कम खपत करेंगे और बहुत लंबे समय तक चलेंगे।
लाइट से कम्यूनिकेशन
रोशनी के जरिए संचार कोई नई बात नहीं है। रोमन एक-दूसरे से संपर्क करने के लिए आग का इस्तेमाल करते थे। समुद्र में बने लाइट हाउस जहाजों को आने-जाने का रास्ता तलाशने में काफी समय से मदद करते रहे हैं। फिलहाल वायरलेस कम्यूनिकेशन रेडियो तरंगों के जरिए अपना रास्ता तय करता है। लेकिन अब रोशनी के जरिए कम्यूनिकेशन की संभावना तलाशी जा रही है। हाल ही में नासा और अमेरिकी आर्मी ने हाई स्पीड लेजर के जरिए कम्यूनिकेशन पर रिसर्च शुरू की है। लिटिल कहते हैं कि अलग-अलग तरह की वायरलेस डिवाइस के लिए अलग-अलग फ्रीक्वेंसी पर रेडियो तरंगें छोड़ी जाती हैं।
इनकी संख्या काफी ज्यादा होने के कारण इनका एक जाल सा बन जाता है, जिसमें एक फ्रीक्वेंसी का दूसरी फ्रीक्वेंसी की तरंगों में मिलने की आशंका पैदा हो जाती है। नेटवर्क भी बहुत तेज नहीं रह पाता। इसके उलट, लाइट से नेटवर्किन्ग तरंगों की इस भीड़ से अलग होगी। यह सीधी खास यूजर और डिवाइस तक नेटवर्क पहुंचाएगी। यह तरीका ज्यादा सेफ भी होगा।
ग्रीन वायरलेस नेटवर्क
लिटिल और उनके साथी रिसर्चरों ने एलईडी बल्बों के जरिए वायरलेस रूट पर प्रयोग शुरू कर दिया है। योजना के अगले चरण में दुनिया में एलईडी बल्बों का प्रसार बढ़ाया जाना है। इन बल्बों में ऊर्जा की खपत काफी कम होती है। एलईडी कंप्यूटर स्क्रीन से लेकर ट्रैफिक लाइटों तक बहुत सी जगह दिखाई देते हैं। हालांकि, एलईडी बल्बों का घरों में इस्तेमाल शुरू होने में थोड़ा वक्त लग सकता है क्योंकि यह काफी महंगा है। फिलहाल एक बल्ब की कीमत 30 डॉलर (करीब 1300 रुपये) है। हालांकि, यह आम बल्बों की तुलना में 50 गुना ज्यादा समय तक चलता है।
स्मार्ट हाउस, स्मार्ट कार
यह प्रयोग अमेरिका के शहरों में सस्ता वायरलेस नेटवर्क देने तक ही सीमित नहीं है। लिटिल लगभग हर चीज को स्मार्ट तरीके से वायरलेस सिस्टम से जोड़ने का मकसद लेकर चल रहे हैं। इसका इस्तेमाल वीइकल्स में भी किया जा सकता है। लिटिल कहते हैं कि ऑटो इंडस्ट्री में यह बेहद कारगर होगा। अमेरिका के कई स्टेट की सरकारें लिटिल की इस योजना में आर्थिक मदद दे रही हैं।
नोबेल फ़ाउंडेशन यूँ तो पूर्व में नामांकित लोगों के नाम गुप्त रखती है लेकिन अब उसने 1901 से लेकर 1956 तक नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित लोगों के नाम सार्वजनिक किए हैं. इस सूची के अध्ययन से पता चलता है कि 50 के दशक में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को 11 बार शांति पुरस्कार के लिए नामांकन मिला था. उन्हें 1950 में दो लोगों की ओर से नामांकित किया गया था. नोबेल फ़ाउडेशन की वेबसाइट के मुताबिक नेहरू ने भारत में संसदीय सरकार स्थापित करने में मदद की, वे आज़ादी की लड़ाई के प्रमुख नेताओं में से थे. उन्हें तटस्थ विदेश नीति और गांधीजी के मूल्यों पर चलने के लिए 1950 में शांति नोबेल के लिए नामांकित किया गया था. इस वर्ष का शांति पुरस्कार अमरीकी कूटनयिक राल्फ़ बूंचे को फ़लस्तीनी इलाक़ों में मध्यस्थता करने के लिए मिला था. ग्यारह बार हुआ नामांकन वर्ष 1951 में भी उन्हें तीन अलग-अलग लोगों ने नामांकित किया था जिस पर नोबेल समिति ने विचार किया. एक नामांकन 1946 में नोबेल शांति पुरस्कार जीतने वाले अमरीका के एमिली ग्रीन बाल्च ने किया था. इस नामांकन का मूल्यांकन ओस्लो के प्रोफ़ेसर जेन्स अरूप सीप ने किया . पुरस्कार अंतत फ़्रांसीसी ट्रेड यूनियन नेता लिओन यूहॉक्स को मिला था. फिर 1953 में नेहरू को तीन बार शांति पुरस्कार के लिए नामांकन मिला. तीनों नामांकन बेल्जियम की ओर से आए थे- बेल्जियन नेशनल असेंबली के सदस्यों की तरफ़ से. इस वर्ष जॉर्ज सी मार्शल को शांति पुरस्कार मिला था जिन्होंने दूसरे विश्व युद्ध में अमरीकी सेना का नेतृत्व किया था. वर्ष 1954 में नेहरू (और पूर्व ब्रितानी प्रधानंत्री एटली) को दो बार नामांकित किया गया. उन्हें प्रोफ़ेसर सीप ने ही दोनों बार नामांकित किया था. उन्हें 1947 में ब्रिटेन और भारत के बीच शांतिपूर्ण तरीके से हल निकालने के लिए नामांकन मिला था. आख़िरी बार नेहरू का नाम 1955 में नोबेल के लिए आगे बढ़ाया गया था. इस वर्ष किसी को भी शांति पुरस्कार नहीं दिया गया था. यानी कुल 11 बार नेहरू को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन मिला लेकिन वे कभी नहीं जीत पाए. भारत की ओर से महात्म गांधी को भी शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था लेकिन उन्हें ये पुरस्कार दिया नहीं गया. हाल ही में नोबेल फ़ाउंडेशन के कार्यकारी अध्यक्ष माइकल सोहलम ने अफ़सोस जताया था कि गांधीजी को नोबेल पुरस्कार नहीं दिया गया.
भारत की ओर से न केवल महात्मा गांधी बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू भी नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित हो चुके हैं-वो भी कुल 11 बार.
अमरीकी सरकार के कर्ज़े इतने बढ़ गए हैं कि न्यूयॉर्क में लगाई गई 'नेशनल डैटक्लौक' इतने बड़े आंकड़ों को जगह नहीं दे पा रही है
ये क्लौक एक डिजिटल काउंटर है जिसपर राष्ट्रीय कर्ज़ के आंकड़े लिखे जाते हैं और ताकि जनता ये जान सके की अमरीकी सरकार का कर्ज़ कितना हो गया है.
लेकिन जब ये कर्ज़ पिछले महीने 100 ख़रब डॉलर से ज़्यादा हो गया तो ये पूरी रकम डिजिटल काउंटर पर लिखने की जगह ही नहीं बची.
ये क्लौक लगाने वालों का कहना है कि दो शून्य और लगाने की जगह इस डिजिटल काउंटर बनानी होगी तभी अमरीका का पूरा राष्ट्रीय कर्ज़ इस पर लिखा जा पाएगा.
इस क्लौक के बोर्ड को 1989 में लगाया गया था जब 27 ख़रब डॉलर के कर्ज़ को इस पर दिखाया गया था.
इस क्लौक का अविष्कार सेयमर डर्स्ट ने किया था और उनके पुत्र डग्लस डर्स्ट का कहना है कि इस क्लौक में कुछ बदलाव किया जाएगा और अगले साल की शुरुआत में ये दोबारा सही आंकड़े दिखाना शुरु कर देगी.
फ़िलहाल डॉलर के इलैक्ट्रॉनिक आंकड़े की जगह एक अतिरिक्त आंकड़ा इस्तेमाल किया जा रहा है.
कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वित्तीय संकट को झेल रही अमरीकी अर्थव्यवस्था में सरकार के हाल में दिवालिया हुई कंपनियों को दिए 700 अरब डॉलर के पैकेज के बाद अमरीका का राष्ट्रीय कर्ज़ 110 ख़रब डॉलर हो जाएगा.